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| उपजोन खरगोन में निकलेंगी ... |
1 sep 2010
खरगोन (मध्य प्रदेश)
गायत्री शक्तिपीठ खरगोन में १८ जुलाई को उपजोन के वरिष्ठ कायर्कत्ताओं की गोष्ठी हुई । इसमें खरगोन, बड़वानी, झाबुआ, आलीराजपुर, खण्डवा एवं बुरहानपुर के लगभग ३०० परिजनों ने भाग लिया । इसे संबोधित करते हुए डॉ. शंकरलाल पाटीदार ने भोपाल से आरंभ हो रही जन्म... |
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तुम्हें ही करना है भटके-बिखरे देवत्व का संगठन, उन्मत्त असुरता का दमन
माँ! हमें विसंगतियों से उबारो
जय माँ दुर्गे! माँ हम आपका जय-जयकार तो खूब करते हैं, दोनों नवरात्रियों में आपके मूर्ति-विग्रह स्थापित करके खूब उत्सव मनाते हैं, लेकिन लगता है कि आपके प्राण-प्रवाह से ठीक प्रकार सम्पर्क नहीं बना पाते । इसीलिए शक्ति साधना के लाभों से, आपके अमोघ अनुग्रह से वंचित ही रह जाते हैं । शायद इसी कारण अपने व्यक्तित्व के अन्दर भी तथा बाहर समाज में व्याप्त आसुरी शक्तियों के सामने कमजोर पड़ जाते हैं, मोर्चे हार जाते हैं ।
हे माता! विधाता ने मनुष्य को दिव्यता से सम्पन्न बनाया है । उसका उपयोग करके मनुष्य अपने इर्दगिर्द स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है, ऐसा करता रहा है । किन्तु आसुरी प्रवृत्तियाँ, देव वृत्तियों पर हावी होकर मनुष्य के स्वर्गीय वातावरण को तहस-नहस करती रही हैं, कर रही हैं और हम दुर्बल-असहाय की तरह सब कुछ झेल रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है माँ?
आत्म समीक्षा करते हैं, तो पाते हैं कि हम तमाम विसंगतियों के शिकार हो रहे हैं । देव वृत्तियाँ सोई-सी, दुर्बल स्थिति में पड़ी हैं, बिखरी हैं । आसुरी प्रवृत्तियाँ जाग्रत्-प्रबल हैं और संगठित हैं ।
कथित भले लोग अपनी भलाई, सद्वृत्तियों के नाते स्वर्गीय सुख की कामना भर करते हैं, देवत्व के विकास की साधना नहीं करते । स्वर्ग प्राप्ति के अपने अधिकार पाने के लिए तो आतुर रहते हैं, स्वर्गीय वातावरण के विकास के अपने कर्तव्य का बोध नहीं करते । कतर्व्य पालन के लिए ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के अभाव में लक्ष्य तक नहीं पहुँच पाते । सामने आने वाली स्वाभाविक कठिनाइयों का सामना नहीं कर पाते । अपनी-अपनी विशेषताओं के अहंकार में साथ वालों की विशेषताओं की उपेक्षा करते और बिखरे ही रह जाते हैं । कामनाएँ करते हैं, लक्ष्य के लिए सहयोग-संघर्ष न करके एक-दूसरे पर दोषारोपण करते हैं, अपना-अपना रोना रोते रहते हैं ।
इसके विपरीत आसुरी प्रवृत्तियों वाले थोड़े से लोग हम पर हावी हो जाते हैं । वे अपनी सीमाएँ समझते हैं । उनके लक्ष्य भले ही स्वाथर्परक-हीन कोटि के हों, किन्तु वे मागर् में आने वाली कठिनाइयों से जूझने के शौर्य भरे संकल्प के साथ कार्यक्षेत्र में उतरते हैं । अपने तमाम दोषों के बावजूद एक-दूसरे की विशेषताओं का सम्मान तथा उपयोग करते हुए सुसंगठित होकर आगे बढ़ते हैं । असफलताओं के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण न करके अपने तंत्र को और पुष्ट तथा प्रभावी बनाने का क्रम अपनाते हैं, इसीलिए सफल हो जाते हैं ।
माँ! हम बच्चों से भूल तो हो रही है, लेकिन उबारना तो तुम्हें ही है । पुत्रों की कुपुत्रता को माता ही तो ठीक करने में समर्थ होती है । ऐसी ही विषम परिस्थितियों में तो तुम्हारा स्मरण-आवाहन किया जाता रहा है । ऐसी ही परिस्थितियों में तो माता तुमने देवताओं का दंभ मिटाकर उनमें सहकार जगाकर अपना मातृत्व सार्थक किया है । हे असुर निकंदिनि! आसुरी वृत्तियाँ चाहे हमारे अन्दर घुसी बैठी हों या बाहर जमी बैठी हों, उनका उपचार तो तुम्हीं करोगी ।
झंकार करो ऐसी-हुंकार भरो ऐसी हे मातेश्वरि! हम विकल होकर निवेदन कर रहे हैं कि मनुष्य के हृदय में सुप्त देवत्व को जाग्रत् करने वाली तुम्हारी ममतामई झंकार उभरे, सोया देवत्व जागे, अपने स्वरूप को पहचानें, आपके अनुशासन में सुसंगठित होकर आगे बढ़ें और अपने लक्ष्य के पूर्व रुकें नहीं ।
कृपा करो माँ! हृदय में सोये देवत्व को जगा दो । हम हीन कामनाओं से ऊपर उठें, श्रेष्ठ भावनाओं का वरण करें । कठिनाइयों का रोना रोने की कायरता छोड़कर उनसे लोहा लेने की बहादुरी हममें उभरे । अपनी विशेषताओं पर इतराने और सहयोग-सहकार से कतराने की मूढ़ता से उबरें । विशेषताएँ आपकी धरोहर मानकर परस्पर सहयोग पूर्वक उन्हें जीवन्त बनाने की समझदारी अपनाएँ ।
पूर्व काल में भी तो ऐसा ही हुआ है माते! जैसे ही देवों ने अपनी विशेषताएँ एकत्रित कीं, आपका आशीर्वाद उन पर बरस उठा । आपने योगक्षेम अपने हाथ में ले लिया । हम पुनः ऐसा ही चाहते हैं माँ! हमारे शुष्क हृदयों में अपनी सरस झंकार संचारित कर दो माँ! आप ही गौरी रूप में प्रवृत्तियों का शोधन करती हैं और जरूरत पड़ने पर आप ही काली बनकर दुष्टता का शोषण कर लेती हैं । आप सर्वसमर्थ हैं माते!
हमने सुना है आपकी हुंकार मात्र से असुरता विदीर्ण हो जाती है । क्यों न हो? जाग्रत् प्रकाश के आगे घने से घना, पुराने से पुराना अंधकार कैसे टिक सकता है? ममतामयी जाग्रत् मातृसत्ता के सामने हृदयहीनता, निष्ठुरता कैसे ठहर सकती है? अग्नि के पास आते ही निष्ठुर ओले सरस जल बन जाते हैं । अग्नि और वायु के संघात से नीचे की ओर बहने वाला पानी जीवनदायी मेघ बनकर आकाश में विचरण करने लगता है ।
हे मातेश्वरि! अपनी वह दिव्य झंकार फिर से संचरित करो । अपनी वह प्रबल हुंकार फिर जाग्रत् करो । हम उसके लिए तैयार हैं । हमें वह प्रवृत्ति दें कि हम आपका वरण करें । आपकी ज्योति को अंतःकरण में घारण करें । माँ अपने प्रचण्ड भर्ग से हमारी हीन वृत्तियों को भून डालें । अपनी दिव्यता के अनुदान से हमें कृतार्थ करें । हम फिर से अपने कर्तव्य बोध के साथ देवोचित जीवन क्रम अपनाएँ ।
या देवी सर्व भूतेषु .........
हे देवि! हम आपके स्थूल विग्रह तक अटक कर न रह जायें । आपके विश्वरूप का दर्शन कर सकें, उसे पहचान सकें, उसका वरण कर सकें, ऐसी सामर्थ्य हमें प्रदान करें । देवतागण भले ही अपनी भूलों, अपने दोषों के कारण असुरों से हार जायें, किन्तु वे आपकी माया और महिमा को भली प्रकार जानते हैं । उस पर विश्वास रखते हैं तथा आपको परम चेतना के रूप में सभी प्राणियों, सभी पदार्थों में देखते हुए, श्रद्धापूर्वक 'नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै नमो नमः' कहकर आपको नमन करते हैं । जो आपको विश्वरूप में अनुभव करते हैं, उनके कल्याण के लिए आप विभिन्न रूपों में प्रकट होती हैं ।
असुर भले ही अपनी साधना के बल से देवों से जीत जायें, किन्तु वे आपके प्रकट होने पर भी अहंकार की अधिकता तथा श्रद्धा की कमी के कारण आपको पहचान नहीं पाते । आपका मनोहारी नारी-रूप देखकर उस पर अपना अधिकार जाताने का प्रयास करते हैं और अंततः नष्ट होते हैं ।
हे मातेश्वरि! हमें देवताओं के पातक से तो बचाएँ, किन्तु उनकी श्रद्धा दृष्टि हममें जाग्रत् कर दें । हम आपको विभिन्न वृत्तियों और शक्तियों के रूप में संव्याप्त देख सकें तथा अपनी भूलों के बावजूद भी आपकी शरण में जा सकें, आपकी कृपा का वरण करके कृतार्थ हो सकें, ऐसा अनुग्रह करें । हम असुरों की तरह अपने धनबल, बुद्धिबल आदि के मद में आपका मनचाहा उपयोग करने की धृष्टता न करें ।
दृष्टि को निर्मल कर दें
हे धूम्रविलोचन नाशिनि! हमारे स्थूल-सूक्ष्म नेत्रों के आगे आये भ्रम के कुहासे को नष्ट कर दें । वह धुंध हटते ही हम देख-समझ सकेंगे कि ''सारी विद्याएँ आपकी ही विभिन्न धाराएँ हैं तथा संसार की सभी नारियाँ आपकी ही प्रतिमूर्ति हैं ।'' फिर हमें आपकी कृपा से प्राप्त विद्याओं का अहंकार नहीं होगा । तब तो हम उनको आपके द्वारा सौंपी गई थाती मानकर उन्हें आपके ही अनुशासन में प्रयोग करने में अपना हित मानेंगे ।
हे जगन्माता! आप तो सदा अनुग्रह करने वाली हैं । जब आप प्रसन्न होती हैं तो साधकों के रोगों का नाश करके भावों का विकास कर देती हैं । जब आप रुष्ट होती हैं, तो साधकों की कामनाओं को नष्ट कर उन्हें मुक्ति के मार्ग पर दौड़ा देती हैं । इसलिए आपके संरक्षण में तो सभी प्रकार हमारा कल्याण है । हमें अन्दर से यह भरोसा हो जाय कि माँ का प्यार हमारे सद्भावों, सद्विचारों, सद्गुणों को बढ़ायेगा तथा माँ की मार हमारे दुर्भावों, दुर्विचारों और दुर्गणों को नष्ट कर देगी । माँ की शरणागति में हमारा तो सदैव हित ही है, कल्याण ही है ।
रूपं देहि, जयं देहि
हे सर्व हितकारिण! बालक जिस रूप में भी आपके पास पहुँचे, आप तो उसका हित साधन ही करती हैं । यदि मल से सना बालक है, तो उसको निर्मल बनाकर सबके प्यार का पात्र बना देती हैं । यदि साफ-सुथरा होता है तो उसे दिव्यभाव का स्पर्श देकर धन्य कर देती हैं । फिर हम आपके सामने ढोंग करके क्यों आयें?
हे कल्याणी! हम आपकी शरण में जैसे भी हैं, वैसे रूप में पहुँच गये हैं । अब आप कृपा करें... । हमें अपने स्वरूप (आत्मरूप, आपके अंशी होने) का बोध करा दें ।
हे आदिशक्ति! हमें अपने अंदर तथा अपने आसपास के शत्रुओं (अंदर के हीन भावों, संस्कारों तथा बाहर के हीन आकषर्णों) पर विजय प्राप्त करा दें । ये स्थूल-सूक्ष्म शत्रु वैसे बड़े दुधर्ष-अजेय जैसे लग सकते हैं, किन्तु आपके सामने इनकी क्या बिसात?
हे मंगलमयी! हमें अपने अनुरूप पुण्य-यश का भागीदार बनायें । हम अपयश के आकर्षण से बचें । हमारी प्रतिष्ठा हृदयहीन धन या बल सम्पन्नों के रूप में न हो, हम देवीपुत्र, देव गुणों से युक्त, दिव्य संपदाजन्य दिव्य यश के भागीदार बनें ।
हे असुर निकंदिनि! आपके अनुरूप उक्त उपलब्धियों के मार्ग में रोड़ा बनकर आने वाले दोषों का आप संहार कर दें, ताकि हम आपके निदेर्शन में अभीष्ट लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते रह सकें ।
हे जगदम्बे! हमें कुछ और कौशल आये या न आये, हम पूजा-उपचार की विभिन्न विधियाँ सीख पायें या न सीख पायें, किन्तु आपके निदेर्शों का अनुसरण करने की सवर् क्लेशहारिणी, मंगलदायिनी प्रवृत्तियाँ अवश्य हमारे अंदर जगा जायें । हम जैसे भी हैं, आपके हैं, आपके प्रति समर्पित हैं, ऐसा जानकर जैसा उचित हो, वैसा करें । |
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