शांतिकुंज सहर्ष मना ज्ञान और प्रेम का ...
युगसृजेता-शूरमाओं के अंतस् को छू गया ऋ...
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विश्वम् पुष्टम् ग्रामे अस्मिन् अनात...
केशरिया उमंगों ने खिलाये तिरंगे के रं...
आदर्श टिहरी ग्राम को मिला शांतिकुंज क...
उपजोन खरगोन में निकलेंगी ...

1 sep 2010
खरगोन (मध्य प्रदेश)
गायत्री शक्तिपीठ खरगोन में १८ जुलाई को उपजोन के वरिष्ठ कायर्कत्ताओं की गोष्ठी हुई । इसमें खरगोन, बड़वानी, झाबुआ, आलीराजपुर, खण्डवा एवं बुरहानपुर के लगभग ३०० परिजनों ने भाग लिया । इसे संबोधित करते हुए डॉ. शंकरलाल पाटीदार ने भोपाल से आरंभ हो रही जन्म...

अर्धांगिनी प्रभु 'श्रीराम' की, मातु 'भगवती' नाम तुम्हारो ।
अर्धांगिनी प्रभु 'श्रीराम' की, मातु 'भगवती' नाम तुम्हारो ।
जातिवाद के विष का शमन किया जाय और उसे भड़काया न जाय
श्रावणी पर्व 'द्विजत्व' को जीवन्त बनाने वाला महान पर्व है
जन्म शताब्दी वर्ष २०११ के कार्यक्रमों का स्वरूप समझें-तैयारी करें
यह गुरु पूर्णिमा नैष्ठिकों के लिए आध्यात्मिक उन्नति की असाधारण संभावनाएँ ल...
जीवन में 'कमाल' पैदा करना है? तो जीवन में कबीर को जाग्रत् करें
सत्संकल्प के सूत्रों को आत्मसात करना, जन-जीवन में स्थापित करना जरूरी है कथनम...
जागो माँ र्दुगे! युगशक्ति के रूप में अपनी प्रचण्ड धाराओं का विकास करो ।
साधना करें शक्ति के जागरण, नियमन और सदुपयोग की
विद्या विस्तार आयोजनों ने जगाया क्षेत्रीय परिजनों में नया आत्मविश्वास
परिजनों में सुसंस्कार जगाएँ, यज्ञीयभाव से अनुप्राणित अन्न खायें-खिलायें ।
युगऋषि की सिद्ध विद्याओं के अभ्यास में आलस्य-प्रमाद न बरतें
अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुसार एक-दो भी अपनाएँ तो निहाल हो जाएँ
उपासना और जीवन-साधना की विद्या का स्तर निरंतर बढ़ता रहे
पहला चरण पूरा होते ही अगले चरण पूरे करने के लिए कमर कसें
गुरुसत्ता की अन्तर्वेदना को समझें, अनिष्ट से बचें, अनुदान पायें
युगदेवता के नवसृजन अनुदानों से कोई भी वंचित न रह जाये
वसन्त पर्व के दिव्य अनुदानों को सँजोने, सार्थक बनाने के लिए तैयार हों
नये क्षेत्रों में थोड़े प्रयास से चल पड़ने वाले 'प्रज्ञा मंदिर' सक्रिय हों ।
साधना करें शक्ति के जागरण, नियमन और सदुपयोग की
12-9-2008

आत्मशक्ति से युगशक्ति के जागरण के संदर्भ में पूर्ण जागरूक रहें

नवरात्रि के संदर्भ में


शारदीय नवरात्रि इस वर्ष दिनांक ३० सितम्बर से ८ अक्टूबर तक पड़ रही है । हर साल की तरह नये-पुराने परिजन जगह-जगह सामूहिक साधनाओं, अनुष्ठानों की व्यवस्थाएँ बनायेंगे । यह सब तो किया ही जाना चाहिए, किन्तु उसे यंत्रवत् ढर्रे से ऊपर उठाकर समय की आवश्यकता पूर्ति के लिए योजनाबद्ध शक्ति साधना का रूप देने के भी प्रयास किए जाने चाहिए । इन प्रसासों को दो प्रमुख धाराओं में वर्गीकृत किया जा सकता है ।

१. अपने देव परिवार द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले आयोजन ।
२. अन्य श्रद्धालु संगठनों द्वारा किए जाने वाले आयोजन ।
उक्त दोनों प्रकार के आयोजनों को सार्थक और प्रभावशाली बनाने के लिए प्रयत्न-पुरुषार्थ किए जाने चाहिए । आगे की पंक्तियों में उक्त विषयों को स्पष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है ।

१. अपने परिवार के आयोजन

इनमें अधिक से अधिक सुविधा जनक स्थानों पर, अधिक से अधिक परिजनों को नौ दिवसीय साधना अनुष्ठान कराने के प्रयास किए जाते हैं । इन्हें करने-कराने की रीति-नीति एवं विधि-व्यवस्था से अपने परिवार के नैष्ठिक साधक भली प्रकार परिचित भी हैं तथा अभ्यस्त भी । इन अनुष्ठानों के अंतर्गत पू.गुरुदेव ने दो मुख्य चरण पूरे करने के नियम बतलाये हैं -१. जप साधना २. तप साधना । इनके संतुलित समन्वय से अनुष्ठान प्रभावी बनते हैं ।

अनुष्ठान क्या? -

पू.गुरुदेव कहते रहे हैं कि साधकगण सामान्य क्रम से भी नियमित साधना करते ही रहते हैं । कभी-कभी निश्चित समय सीमा में निश्चित उपलब्धि के संकल्प के साथ साधक जब अपनी पूरी शक्ति लगाकर निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने की ठान लेता है, तो उस जीवन्त साधना प्रक्रिया को अनुष्ठान कहा जाता है । ऐसे अनुष्ठानों के जप-तप के संकल्पों के भी दो वर्ग रहते हैं - १.इनमें है (क) सामान्य वर्ग और (ख) विशिष्ट वर्ग । दोनों वर्ग के साधक संकल्प और सामूहिक जप-सत्संग के क्रम एक ही स्थान पर चलाते रहें, किन्तु अपने-अपने साधनात्मक लक्ष्यों का निर्धारण विवेक पूर्वक तथा निर्वाह साहस पूर्वक करें ।

(क) सामान्य वर्ग - इसमें अधिकांश नये साधक होते हैं । वे श्रद्धा पूर्वक निर्धारित जप संख्या (नौ दिन में २४००० मंत्र जप या २४०० मंत्र लेखन या २४० गायत्री चालीसा पाठ) की पूर्ति कर लें, यही काफी है । बच्चों तथा अशिक्षितों को पंचाक्षरी मंत्र (ॐ भूर्भवः स्वः) करने की भी छूट दी जाती है । उद्देश्य यही रहता है कि वे अपने मन-काया के अभ्यास को संकल्प में बाँधना सीख लें ।

जप के साथ तप के भी सामान्यतः ५ नियम अनुष्ठान काल में निभाने की बात पू.गुरुदेव बतलाते रहे हैं । १. उपवास (आहार का संयम), २. ब्रह्मचर्य का सेवन, ३. भूमि या तखत पर सामान्य बिछावन का उपयोग, ४. अपने शरीर की सेवाएँ स्वयं करना तथा ५. हिंसा से प्राप्त वस्तुओं-चमड़े, रेशम आदि का उपयोग न करना ।

सामान्य वर्ग के साधकों के लिए यह नियम बतलाये भी जाते रहे हैं तथा अधिकांश साधक मोटी दृष्टि से इनका निर्वाह कर भी लेते हैं । इनमें अनजाने छोटी-मोटी चूक होने पर प्रायश्चित्त रूप में एक-दो मालाओं का अतिरिक्त जप या कुछ अतिरिक्त श्रम करने की मयादाएँ भी बनाई जाती रही हैं । यह सब निष्ठा पूर्वक किया-कराया जाना उचित है । लक्ष्य यही है कि हर साधक अपने जीवन को पहले की अपेक्षा अधिक व्यवस्थित और तेजस्वी बनायें ।

(ख) विशिष्ट वर्ग - जो साधक नौ दिवसीय साधना अनुष्ठान करते रहे हैं, उन्हें अपने संकल्प और लक्ष्य सामान्य वर्ग से ऊँचे स्तर के रखने चाहिए । उन्हें अपने साधनात्मक, आध्यात्मिक स्तर को अगली ऊँची सीढ़ियों तक पहुँचाने के नैष्ठिक प्रयास करने चाहिए । प्राथमिक कक्षा पास कर लेने पर छात्रों को अगली कक्षा के पाठ्यक्रम पूरे करने होते हैं । जप-तप के सामान्य नियम निभा लेने में जो साधक अभ्यस्त हो जाते हैं वे अपने व्यक्तित्वों को युगऋषि के निर्देशानुसार विकसित करने के लिए, आगे के चरण पूरे करने के लिए कमर कसें, यही जरूरी है ।

जप - जप संख्या पूरी कर लेना तो उनके लिए आसान हो जाता है, जप की गहराई बढ़ाने के लिए उन्हें संकल्प पूवर्क प्रयास करना चाहिए । वे कुछ इस तरह के प्रयोग कर सकते हैं -
* जप के कम्पनों को पूरे शरीर में, हर अंग, हर कोष में संचरित होता हुआ अनुभव करें ।
* शरीर में स्थित पाँचों तत्त्वों को स्पंदित होता देखें तथा उन स्पंदनों का विस्तार विराट प्रकृति के पंच तत्त्वों तक होता अनुभव करें ।
* अपने अंतःकरण चतुष्टय, मन के रस, बुद्धि के विवेक, चित्त के संस्कारों तथा अहंकार (स्वयं के वास्तविक स्वरूप) को निखारने के लिए उन जप स्पंदनों को प्रेरित करते रहें ।
* गायत्री मंत्र के एक-एक चरण के भावों को क्रमशः अपनी साधना मनोभूमि में गहराई से स्थापित करने का भाव करें । जैसे -
१. ॐ से जिस परमात्म सत्ता का बोध होता है, उसे भूः भुवः स्वः (धरती, अंतरिक्ष एवं आकाश) में सर्वत्र संव्याप्त अनुभव करें ।
२. वह सबका उत्पादक सविता रूप में अपने तेज को सर्वत्र बिखेर रहा है । हमारे लिए वही माँ के दूध की तरह वरणीय, सेवन करने योग्य है । हमारे अंदर की दिव्यता को विकसित-पोषित करने में समर्थ हैं ।
३. उस सविता देव के भगर् (दोषों को भून डालने तथा दिव्यता बढ़ाने में समर्थ तेज) को हम अपने अंतःकरण में धारण कर रहे हैं ।
४. वह दिव्य प्रवाह हमारे व्यक्तित्व के तमाम घटकों को, प्रकृति की तमाम इकाइयों को, सभी मानवों-प्राणियों को गरिमापूर्ण दिशा की ओर प्रेरित कर रहा है ।
जपयज्ञ का भाव करें । परमात्म सत्ता, गुरुसत्ता, मातृसत्ता का दिव्य प्राण हमारे चारों ओर दिव्य अग्नि की तरह स्थापित है । हमारा व्यक्तित्व समिधा की तरह उस अग्नि के साथ एकरूप हो रहा है । प्रत्येक मंत्र आहुति के रूप में उस ज्वाला को तीव्रतर कर रहा है ।

* पू.गुरुदेव द्वारा कराए गये विभिन्न ध्यानों में से किसी ध्यान के एक-दो सूत्रों को अपने ऊपर घटित होता अनुभव करें ।
उक्त या इसी स्तर के विभिन्न प्रयोग अपने जप को अधिक प्राणवान बनाने के लिए किए जा सकते हैं ।

तप - पुराने साधकों के लिए तप के प्राथमिक चरण सहज साध्य हो जाना स्वाभाविक है । तब जीवन को अधिक पवित्र तथा अधिक प्रखर बनाने वाली जीवन साधना के सूत्रों को क्रमशः साधने की तप साधना प्रारंभ कर देनी चाहिए । जैसे -
आत्म समीक्षा की प्रौढ़ता - बच्चों को अपने हर कार्य श्रेष्ठ ही लगते हैं । इसी प्रकार बाल बुद्धि के साधकों को अपना जीवन निर्दोष दिखाई देता है । कोई बतलाए तो उसे बाल बुद्धि के तर्कों, बहानों से झुठलाने का प्रयास वे करने लगते हैं । प्रौढ़ साधकों को आत्म दर्शन, आत्म समीक्षा में अधिक कुशल होना चाहिए । गुरुसत्ता से विकल होकर निवेदन करना चाहिए कि हे प्रभु! हमें अपने दोष दिखेंगे नहीं अथवा यदि हम उन्हें स्वीकार करने एवं ठीक करने का साहस न जुटा पायेंगे, तो आपके अगले चरण के श्रेष्ठतर कार्यों को पूरा करने की पात्रता कैसे विकसित कर पायेंगे? इस तप में गति बढ़ेगी तो फिर आत्मबोध, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास की अगली सीढ़ियाँ चढ़ने में सफलता मिलेगी ।

स्वाध्याय तप - गुरुदेव ने जीवन के हर पक्ष को उन्नत तथा तेजस्वी बनाने के लिए तमाम सूत्र दिये हैं । वे केवल पुस्तकों के अध्याय बनकर रह गये हैं, वे हमारे जीवन के अध्याय भी बनें, हमारी जीवन साधना के अंग बनें, तब बात बने ।

अनुष्ठान की अवधि में कुछ सूत्रों को आत्मसात करने के लिए गहन स्वाध्याय, तप के संकल्प भी किए-कराये जा सकते हैं । पाठ करने की परम्परा इसी स्वाध्याय तप के उद्देश्य से बनायी गयी थी । इसके लिए (क) युग निमार्ण सत्संकल्प के कुछ सूत्रों (ख) जीवन देवता की साधना-आराधना अथवा लोकसेवियों के लिए दिशाबोध जैसी पुस्तकों को (ग) प्रज्ञा पुराण-प्रज्ञोपनिषद् आदि के किसी खण्ड, अध्याय या कुछ मंत्रों आदि को स्वाध्याय तप का माध्यम बनाया जा सकता है ।

सुधी पाठकों-परिजनों के लिए उक्त संकेत यहाँ किये गये हैं । अपने साधना अनुष्ठान को अधिक प्राणवान बनाकर, स्वयं को पू.गुरुदेव की कसौटी पर श्रेष्ठतर साधक बनाने के लिए इसी प्रकार के तमाम प्रयास किये-कराये जा सकते हैं । इसी तप शृंखला में अन्य श्रद्धालु संगठनों द्वारा किए जाने वाले आयोजनों को भी आत्म कल्याण एवं लोक कल्याण की दृष्टि से अधिक प्रभावशाली बनाने के प्रयास को भी शामिल किया जा सकता है ।

२. अन्य संगठनों के आयोजन

नवरात्रि पर्व के नौ दिनों में अनेक धामिर्क संगठन अपने-अपने ढंग से आयोजन करते हैं । उनमें से अधिकांश केवल कर्मकाण्ड की लकीर पीटने वाले, वैभव की चमक-दमक बिखेरने वाले मनोरंजन प्रधान समारोह भर रह जाते हैं । शक्ति साधना के जीवंत सूत्रों का उनमें अधिकतर अभाव ही दिखता है । कहीं-कहीं तो कलाकारों के प्रदर्शन, मनोरंजन फूहड़ रूप भी लेने लगते हैं । उनमें नशा पीकर भक्ति की मस्ती का ढोंग करने के अनगढ़ प्रयास भी जुड़ जाते हैं ।

अधिकांश आयोजकों के भाव तो लगभग ठीक ही होते हैं, किन्तु दिशा हीनता, मनोवैज्ञानिक बारीकियों को समझने के अभाव, आदर्श उद्देश्यों को दृष्टिगत न रख पाने के कारण ही उनके प्रयास भटक जाते हैं । यदि आयोजन समितियों के मूर्धन्यों के साथ समय रहते शिष्ट मण्डल बनाकर संपर्क किया जाये, उन्हें आयोजनों को उच्च स्तरीय प्रयोजनों से जोड़ने के लिए ऋषि के सूत्र समझाने तथा सहयोग देने का प्रयास किया जाये, तो काफी कुछ बात बन सकती है ।

ऋषियों ने व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन को दिशा देने के लिए संस्कारों तथा सामाजिक जीवन को दिशा-प्रेरणा देने के लिए पर्व आयोजनों की श्रेष्ठ परम्पराएँ स्थापित की थीं । यह तथ्य आयोजकों को समझाये जा सकते हैं । उन आयोजनों के साथ दीपयज्ञ जैसे सुगम कार्यक्रम जोड़कर उनमें भाग लेने वालों को स्वस्थ, संयमित, सहयोगपूर्ण जीवन जीने के संकल्पों के साथ जोड़ा जा सकता है । मनों को दूषित तथा वातावरण को प्रदूषित करने वाली अनगढ़ गतिविधियों पर अंकुश लगाने तथा मनों को संस्कारित एवं वातावरण को स्वच्छ बनाने वाली रचनात्मक गतिविधियों को उनके साथ जोड़ा जा सकता है । प्रभावशाली परिजन इसे भी लोकमंगल की तप साधना मानकर कुछ आयोजनों को बेहतर बनाने के लक्ष्य निर्धारित कर सकते हैं । सारांश यह कि हमारे नवरात्रि अनुष्ठान हमें नव सृजन की अगली कक्षा में ले जाने वाले बनें, ऐसे जीवंत प्रयास किए जाने चाहिए । लाल मशाल के प्रतीक के अनुरूप युगशक्ति का स्वरूप जगह-जगह उभरना चाहिए ।
Last Update : 2010-09-06 08:20:11