शांतिकुंज में जन्माष्टमी पर्व पूरे भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया । पर्व के उपलक्ष्य में आयोजित गीत-संगीतमय समारोह को संबोधित करते हुए श्री श्यामबिहारी दुबे ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के साथ सोलह हजार गोपियों के दिव्य रास की कल्पना आज के मनोरंजन प्रधान युग में सहज संभव नहीं है । वस्तुतः ये गोपियाँ वे ऋषि आत्माएँ थीं, जो सगुण सागर ब्रह्म के रसास्वादन के लिए अवतरित हुई थीं । उनका सदैव अपने प्रभु का स्मरण करना और उन्हीं के कामों में लीन रहना ही महारास है । आज परम पूज्य गुरुदेव के रूप में अवतरित उसी चेतना के अंग-अवयव होने का सौभाग्य असाधारण है । आत्मा गोपिका है और परमात्मा पूर्ण पुरुष । परमात्मा की आकांक्षा को पूरा करने की उत्कष्ठा ही आत्मा-परमात्मा का मिलन कराती है । पू.गुरुदेव के सान्निध्य में यह दिव्य रास आज भी चल रहा है ।
भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का मार्मिक चित्रण करने वाला यह समारोह भावविभोर कर देने वाला था । श्री दुबे जी ने कृष्ण के मोर पंख को संयम का प्रतीक और उनकी बाँसुरी को सरस जिंदगी की तान का प्रतीक बताया । इस अवसर पर भगवान श्री कृष्ण, गौ, गीता एवं श्रीदामा, उद्धव, अक्रूर आदि के पूजन के साथ परम पूज्य गुरुदेव, परम परम वंदनीया माताजी एवं माँ गायत्री का पूजन किया गया । मंच से भक्ति गीतों की सरिता सतत प्रवाहित होती रही । |